जर्रा जर्रा हर रोज बिखर रहा है आदमी।
रोज अपनी ही चाल चल रहा आदमी।।
दंभ और द्वेष में जल रहा कोना कोना।
देखकर भी नही सम्भल रहा आदमी।।
रूह अपनी कठपुतली गैर की हाथों का।
खुद ही अपनी सूरत बदल रहा आदमी।।
इश्क के नाम पर ठगा ठगा सा हरदम।
खुदगर्जी की आग में जल रहा आदमी।।
न सूरत बदली न सीरत बदलने की चाह।
बस अपनी ही धुन में चल रहा आदमी।।
मुझको मालूम है दुनियाँ के दस्तूर दिव्या।
बचा कुछ भी बस युही मचल रहा आदमी।।
धन्यवाद
मन के वश मे जल तरंग की तरह उछल रहा,
जवाब देंहटाएंइसके वश में आके मन्नू गिर व सम्भल रहा ।
बेबस बेचारा बदनाम हो रहा आदमी।।
इनसान जो भी गलती करता है मन के वश मे आके करता है ।
जवाब देंहटाएंउसे अपने मन से लड़ना चाहिए न कि किसी मे दोष देखना