पिछले कुछ दिनों में मैंने यही महसूस किया। स्थिति बहुत भयावह नहीं थी, पर इतनी आसान भी नहीं थी कि उसे अनदेखा कर दिया जाए। दर्द था, असहायता थी, कई दिनों तक बिस्तर पर पड़े रहने की मजबूरी थी। उठना, बैठना, चलना—सब किसी परीक्षा जैसा लग रहा था। शरीर जवाब दे रहा था, पर उससे ज्यादा मन थक रहा था। शायद इसलिए नहीं कि चोट लगी थी, बल्कि इसलिए कि उस समय मैंने लोगों को बहुत करीब से देख लिया।
मैंने हमेशा अपने रिश्तों को पूरे मन से निभाया। किसी के दुख में चिंता की, किसी के दर्द में साथ खड़ी रही, किसी की छोटी परेशानी को भी गंभीरता से लिया। मुझे लगता था कि यही रिश्तों की सच्चाई है—जब कोई गिरता है तो दूसरा हाथ पकड़ लेता है। मगर जब मेरी बारी आई, तब समझ आया कि कई रिश्ते केवल हमारी तरफ से जिए जा रहे थे। कुछ लोगों ने हाल तक पूछना जरूरी नहीं समझा, कुछ ने यह जानने की कोशिश तक नहीं की कि मैं कैसी हूं। और तब पहली बार यह एहसास हुआ कि भीड़ में घिरे रहने और सच में किसी का होना—दो बिल्कुल अलग बातें हैं।
शरीर का आधा दर्द अब कम हो चुका है, लेकिन मन ने जो महसूस किया, वह शायद इतनी आसानी से नहीं जाएगा। क्योंकि इंसान को सबसे ज्यादा चोट तब नहीं लगती जब वह गिरता है, बल्कि तब लगती है जब गिरने के बाद उसे उठाने वाला कोई नजर नहीं आता। उस पल आदमी अपने भीतर बहुत कुछ खो देता है—भरोसा, अपनापन, और कहीं न कहीं खुद को महत्वपूर्ण समझने का भ्रम भी।
अब ईश्वर से बस यही प्रार्थना है कि जीवन में ऐसा समय दोबारा न आए, जहां सांसें चल रही हों लेकिन भीतर से इंसान बिल्कुल अकेला पड़ जाए। क्योंकि शारीरिक दर्द सह लेना शायद आसान है, मगर यह महसूस करना कि आपका दर्द किसी के लिए मायने नहीं रखता—यह भीतर बहुत गहराई तक तोड़ देता है।
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