सोमवार, 11 मई 2026

समाधि में सुकून



मैं खोजने निकली थी सुकून
जीवन की चिर-अशांत वीथियों में,
पर हर मोड़ पर
पीड़ा ने ही मेरा हाथ थामा।
तब एक दिवस
सांझ के धुंधलके में
मैं जा बैठी
एक मौन समाधि के समीप।
वहाँ
न कोई आग्रह था,
न उपालंभ,
न संसार का वह कठोर कोलाहल
जो स्त्री के हृदय को
क्षण-क्षण छलनी करता है।
केवल
शांत पवन थी,
सूखे पुष्पों की गंध थी,
और मिट्टी में सोई हुई
असंख्य थकी आत्माओं का मौन।
मैं देर तक
उस समाधि को निहारती रही—
मानो वह पत्थर नहीं,
मेरे ही हृदय का
अवाक् विस्तार हो।
कैसा अद्भुत है यह संसार—
जीवन भर
जिसे अपने आँसुओं के लिए
एक कोना नहीं मिलता,
मृत्यु उसे
पूरी धरती की निस्तब्धता दे देती है।
मैंने अनुभव किया—
पीड़ा जब अत्यधिक पुरानी हो जाए,
तो वह विलाप नहीं करती,
वह समाधि बन जाती है।
मेरे भीतर भी
कितनी ही इच्छाएँ
अनाम कब्रों-सी पड़ी हैं—
कुछ स्वप्न,
जो कभी उषा बन न सके,
कुछ प्रेम,
जो दीपक की अंतिम लौ-से
काँपते रहे।
संसार ने मुझे
सदैव मुस्कान का वस्त्र पहनाया,
पर किसी ने यह न देखा
कि उस वस्त्र के भीतर
एक नीर-भरी बदली
निरंतर बरसती रही।
समाधि के समीप बैठ
पहली बार लगा—
मौन भी
कितना करुणामय हो सकता है।
वह कुछ कहता नहीं,
फिर भी
मन के समस्त क्रंदन
धीरे-धीरे अपने भीतर समेट लेता है।
उस क्षण
मैंने मृत्यु से भय नहीं किया,
अपितु उसे
एक शीतल शरण-सी पाया।
यदि कभी
मेरे जीवन का अंतिम गीत
मौन हो जाए,
तो मुझे किसी दीपमालिका में मत खोजना—
किसी शांत समाधि के पास
जहाँ संध्या
धीरे-धीरे उतरती हो,
जहाँ पवन
विरह का गीत गाती हो,
और जहाँ
एक थकी हुई स्त्री की आत्मा
अंततः
अपने हिस्से का सुकून पा गई हो।

@स्वरचित सर्वाधिक कर से सुरक्षित

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