मैं नहीं जाऊँगी रोज़-रोज़ गंगाजी में पाप धुलने।
मैं पूरे जीवन मुक्ति का मार्ग नहीं ढूँढूँगी,
इससे कहीं बेहतर विकल्प मैं अपने जीवन में रखूँगी।
मैं ऐसे कर्म करके जाऊँगी
जिनसे मानवता की सेवा हो सके।
किसी भूखे के हिस्से की रोटी बन सकूँ,
किसी रोते हुए चेहरे की वजह से मुस्कान बन सकूँ।
अगर मेरे होने से किसी एक जीवन में भी
थोड़ी सी रोशनी आ जाए,
तो वही मेरे लिए सबसे बड़ा पुण्य होगा।
मैंने देखा है,
बहुत लोग तीर्थों में सिर झुकाकर लौट आते हैं,
पर उनके व्यवहार में दया नहीं होती।
हाथों में माला होती है,
पर शब्दों में करुणा नहीं होती।
मन में ईश्वर खोजते हैं,
पर इंसानियत को भूल जाते हैं।
मैं शायद इतनी धार्मिक नहीं हूँ,
कि हर व्रत, हर पूजा, हर परंपरा निभा सकूँ,
लेकिन मैं इतना ज़रूर चाहती हूँ
कि मेरे कारण किसी का दिल न टूटे।
मेरे शब्द किसी के घाव पर मरहम बनें,
मेरे कर्म किसी की उम्मीद बनें।
अगर किसी वृद्ध माँ के काँपते हाथों को सहारा देना,
किसी अनाथ बच्चे के सिर पर हाथ रखना,
किसी परेशान व्यक्ति की बात सुन लेना
पुण्य है,
तो मैं वही पुण्य कमाना चाहूँगी।
क्योंकि मुझे लगता है
ईश्वर केवल मंदिरों में नहीं रहते,
वो उस रिक्शेवाले की थकान में भी हैं
जो अपने बच्चों के लिए दिनभर मेहनत करता है।
वो उस स्त्री की आँखों में भी हैं
जो अपने हिस्से का सुख छोड़कर
परिवार के लिए जीती है।
वो उस इंसान में भी हैं
जो बिना किसी स्वार्थ के
दूसरों का हाथ थाम लेता है।
मैं मोक्ष मिले या न मिले,
इस चिंता में अपना जीवन नहीं बिताना चाहती।
मैं बस इतना चाहती हूँ
कि जब इस दुनिया से जाऊँ
तो मेरे जाने के बाद
कुछ लोग मुझे मेरे धर्म से नहीं,
मेरी इंसानियत से याद करें।
मेरी पूजा मेरे कर्म हों,
मेरी आरती किसी के चेहरे की मुस्कान हो,
और मेरी यात्रा
चारों धाम से कहीं बड़ी—
एक अच्छे इंसान बनने की यात्रा हो।
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