14 फरवरी पुलमावा शहीदों की शहादत दिवस पर एक अभिव्यक्ति...
प्रेम दिवस मनाती भी तो कैसे..
उस मासूम के हाथों की चूड़ियां टूट गयी थी
प्रेम मन का दर्शाती भी तो कैसे
उस माँ के मंदिर का चिराग बुझ गयी था।
प्रेम तुझपर बरसाती भी तो कैसे
उस बहन के प्रेम का धागा टूट गया था।
प्रेम से अंकन करती भी तो कैसे
उस बच्चे के सर से छाया उठ गया था।
मन विह्वल था प्रेम छुपा सा
वक्त चल रहा था पर कुछ कुछ रुका सा।
सबकुछ तुझको जताती भी तो कैसे
कही सन्नाटा कही शोर दिखती भी तो कैसे
वो वीराना नही था उसका आशियाना उजड़ गया था।
उसे भुला दूं इतनी भी मैं कठोर नही
वो वीर थे मेरे भारत के कोई पाकिस्तानी चोर नही।
मेरे रगों में जबतक रवानी रहेगी
मेरे वीरो तुम्हारी कहानी रहेगी
कोई कितना मिटाए निशा तुम्हारा
मेरी मिट्टी में तेरी निशानी रहेगी।
तुम्हे दिल से नमन है मेरे देश के वीरो
स्वरचित
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