सोमवार, 8 जून 2026

हकीकत से परे

जमीन औरत की, आसमान औरत का" — यह पंक्ति पढ़कर मन सचमुच खुश हो जाता है। लगता है किसी ने औरत को उसके संपूर्ण अस्तित्व के साथ देखा है। लेकिन जब कल्पना से निकलकर हकीकत की धरती पर कदम रखती हूँ तो सवाल उठता है — अगर जमीन औरत की है तो उसके नाम पर निर्णय लेने का अधिकार क्यों नहीं? अगर आसमान औरत का है तो उसकी उड़ान पर इतनी बंदिशें क्यों?
सच तो यह है कि सदियों से औरत को सम्मान के शब्द तो बहुत मिले, लेकिन अधिकार कम मिले। उसे देवी कहा गया, लक्ष्मी कहा गया, शक्ति कहा गया, मगर जब उसकी अपनी इच्छा, अपनी पहचान और अपने अस्तित्व की बात आई तो अक्सर उसे चुप रहने की सलाह दी गई।
शादी से पहले लड़की अपने मायके की होती है। वहां भी उसे अक्सर यह सुनाया जाता है कि "एक दिन पराए घर जाना है।" शादी के बाद ससुराल पहुँचती है तो वहां उसे "बाहरी" होने का एहसास दिलाया जाता है। मायका धीरे-धीरे उसका नहीं रह जाता और ससुराल कभी पूरी तरह उसका बन नहीं पाता। ऐसे में प्रश्न उठता है कि आखिर उसका अपना घर कौन-सा है? वह जगह कहाँ है जहाँ वह बिना किसी शर्त के कह सके — "यह मेरा है"?
औरत का सबसे बड़ा संघर्ष अक्सर रोटी, कपड़ा या मकान का नहीं होता, बल्कि अपनी पहचान बचाए रखने का होता है। वह हर रिश्ते को निभाती है, हर भूमिका में खुद को ढालती है, लेकिन बदले में उसे अक्सर अपनी इच्छाओं, सपनों और भावनाओं की कीमत चुकानी पड़ती है। उसकी मेहनत को कर्तव्य मान लिया जाता है और उसके त्याग को उसकी जिम्मेदारी।
समाज की विडंबना देखिए कि गालियाँ भी औरत के नाम पर गढ़ी गईं। किसी पुरुष को अपमानित करना हो तो निशाना उसकी माँ, बहन या बेटी को बनाया जाता है। इससे बड़ा प्रमाण और क्या होगा कि औरत को सम्मान देने की बातें करने वाला समाज आज भी उसकी गरिमा को सबसे आसान हथियार समझता है?
आज अनेक महिलाएँ अवसाद, अकेलेपन और मानसिक तनाव का सामना कर रही हैं। इसके पीछे केवल एक कारण नहीं है। सामाजिक दबाव, असमान अपेक्षाएँ, भावनात्मक उपेक्षा, निर्णय लेने की स्वतंत्रता का अभाव और हर समय खुद को साबित करने की मजबूरी — ये सब मिलकर उनके भीतर एक ऐसा खालीपन पैदा करते हैं जिसे अक्सर कोई देख नहीं पाता। कुछ महिलाएँ टूट जाती हैं, कुछ विद्रोही हो जाती हैं और कुछ अपने भीतर ही सिमट जाती हैं।
लेकिन इसका दोष केवल पुरुषों पर डालकर भी समस्या का समाधान नहीं होगा। यह एक ऐसी सामाजिक संरचना का परिणाम है जिसमें सदियों से पुरुष और स्त्री दोनों को तय भूमिकाओं में बाँध दिया गया। जिम्मेदारी पूरे समाज की है — परिवारों की, संस्कारों की, शिक्षा की और उन सोचों की जो आज भी स्त्री को एक व्यक्ति नहीं, बल्कि केवल एक भूमिका के रूप में देखती हैं।
औरत को दया नहीं चाहिए, बराबरी चाहिए। उसे आसमान का वादा नहीं चाहिए, उड़ान का अधिकार चाहिए। उसे जमीन का नाम नहीं चाहिए, उस जमीन पर अपना अस्तित्व चाहिए। जिस दिन समाज औरत को किसी की बेटी, पत्नी या माँ होने से पहले एक स्वतंत्र इंसान के रूप में स्वीकार कर लेगा, शायद उस दिन "जमीन औरत की और आसमान औरत का" केवल एक सुंदर पंक्ति नहीं, बल्कि एक सच्चाई बन जाएगी। उस दिन कोई औरत यह नहीं पूछेगी कि उसका घर कहाँ है, उसका अस्तित्व क्या है — क्योंकि वह स्वयं अपने अस्तित्व की पहचान होगी।

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