शुक्रवार, 16 जुलाई 2021

तुमसे ही जीवन था

कई दफ़ा बिछड़ना, कुछ इस कदर भी होता है
जाने वाला जाने से पहले ही, जा चुका होता है...
जाने वो कैसे मुकद्दर की, किताब लिख देता है
साॅंसे गिनती की हैं, ख्वाहिशें बेहिसाब लिख देता है...
जिनकी गलतीयों से भी, मैंने रिश्ता निभाया है
बार-बार मुझे फ़ालतू होने का, अहसास दिलाया है..
कौन हूॅं मैं ऐ-ज़िंदगी तू ही बता
थक गई हूॅं मैं, ख़ुद का पता ढूॅंढते-ढूॅंढते
अंदर से तो कब के, मर चुके हैं हम
ऐ-मौत तू ही आजा, लोग अब सबूत माॅंगते हैं.
किश्तों में, ख़ुदखुशी कर रही है ये ज़िंदगी अब तो

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