सोमवार, 5 अक्टूबर 2020

निर्भया और मनीषा सहित तमाम हादसों की शिकार बेटियों को समर्पित

तमाम उम्र तमन्नाओं में उलझायी गयी।
खिलौना दे दे कर हरदम बहलाई गयी।।

मासूम सा दिल समझ न सका कुछ भी।
मेरे लिए ही ये तमाम दस्तूर बनाई गयी।।

अपनो से यकीन तब और उठ गया मेरा।
करके रुसवा जब दुनिया से हटाई गयी।।

फूलों से सज के जाती अरमान था यही।
आज कांटो से ही मेरी अर्थी सजाई गयी।।

बड़े अरमानों से सजती डोली मेरी भी।
पर हसरतों के चिता में मै जलायी गयी।।

मैं तो एक बेटी थी क्या कुसूर था मेरा।
बाद मरने के  मेरी इज्जत उड़ाई गयी।।

न सताओ अब तो चैन से सोने दो मुझको।
मिन्नतों के बाद भी न मेरी जगहँसाई गयी।।

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